
आसना पार्क की कथा:उत्तम कुमार वनमंडलधिकारी द्वारा कैसे करते हैं इस व्यवस्था का सुधार?
यह देखना है “39 साल में भी अपनी पहचान नहीं बन पाया आसना पार्क “ इस शीर्षक से प्रकाशित हुआ है नवभारत समाचार पत्र के अंतिम पृष्ठ में 19 जुलाई को ,कहने का तात्पर्य है क्या आसन पार्क अपनी पहचान खो चुका है? यहां पर अब ऐसी आलम व्यवस्था है जितने भी वनमंडलधिकारी आए हैं कार्यभार ग्रहण कर उन्होंने इस दिशा में शासकीय खजाने को खाली किया है और पशु पक्षियों के तकनीकी मार्गदर्शन देने वाले पशु चिकित्सा अधिकारियों की नियुक्ति अथवा देखभाल के लिए क्या रखे हैं?पशु पक्षियों ,वन प्राणियों को रखकर जगदलपुर की जनता को लुभाने सपने दिखाते रहे हैं अभी कितने वन प्राणी शेष बचे हैं और पशु पक्षियों यदि गणना की जाए तो रखरखाव का पूरी वस्तु स्थिति उजागर होगी।

पशुचिकित्सा सुविधा मिली कि नहीं मिली क्या खर्चा हुआ? यहां तक पशु पक्षियों के रखरखाव के लिए कितने खर्च हुए पशु चिकित्सा अधिकारी की नियुक्ति तक नहीं की गई है तो पशु पक्षी जीवित कैसे रहेंगे? उनकी चिकित्सा सुविधा का भी लाभ देना चाहिए यह आलम है ,लमनी पार्क का इस प्रकार लगातार पार्क अपनी पहचान खोती गई है और वन विभाग के अधिकारी इस दिशा में कार्य करते रहे अब देखना है कि नए मंडल अधिकारी इस दिशा में किस तरीके से आसन पार्क को अपनी पहचान बनाकर रख सकते हैं इसके पूर्व रेंजर अधिकारी वर्मा इसके प्रभार संचालन प्रभार संचालनमें रहे परंतु वैसे का वैसा ही रहा है अब देखना है अब देखना है कि नए वन मंडल अधिकारी उत्तम कुमार किस प्रकार अपने उत्तम कार्य प्रणाली से इस आसन पार्क का रखरखाव कर सकते हैं…